हम कैसा उत्तराखंड चाहते हैं?

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लोक सभा चुनाव को अब महज ४० दिन बाक़ी हैं, लेकिन देश के इस अंचल में अभी भी कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं उभर रही है. वजह हम यानी मतदाता नहीं, राजनीतिक दल हैं, जो अब भी कन्फ्यूजन की स्थिति में हैं. भाजपा ने तो फिर भी समय रहते अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर डी, लेकिन कांग्रेस अब भी यह फैसला नहीं कर पायी कि किसे टिकट देना है? बहरहाल, सवाल यह है कि क्या हम स्वयं तैयार हैं? क्या हम फैसला कर चुके हैं कि हमें कैसा व्यक्ति चुनना है? कहीं हम भी भ्रमित नहीं हैं? इस भ्रमजाल से निकलने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि पहले हम यह सोचें कि हमें कैसा प्रदेश बनाना है?

उत्तराखंड का मतदाता अक्सर देश की मुख्यधारा के साथ रहता है. क्योंकि वह खुद को दिल्ली के ज्यादा करीब समझता है. उसे अपने प्रदेश से ज्यादा देश की चिंता रहती है. उत्तर प्रदेश भी कभी यही व्यवहार करता था. यही वजह रही कि छः प्रधान मंत्री देते हुए भी उत्तर प्रदेश तरक्की की दौड़ में पीछे रह गया. इसलिए उत्तराखंड के मतदाताओं को भी अब गंभीरता से यह सोचना होगा कि उन्हें कैसा प्रदेश चाहिए. प्रदेश को बने १३ साल हो गए हैं, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि हम बहुत अच्छा राज्य बना रहे हैं. या उत्तर प्रदेश से अलग होकर हमने कोई बहुत महान काम कर दिया है. इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमारे रहनुमाओं ने जो वायदे किये थे, उन्हें ईमानदारी से नहीं निभाया. वायदे करना बहुत आसान होता है, उन्हें निभाना उतना ही मुश्किल. तथाकथित विकास हो रहा है, लेकिन लगता नहीं कि उसके पीछे कोई सोच है. हमारे प्रदेश से लोकसभा और राज्यसभा में कुल आठ सांसद हैं. उन्हें विकास के नाम पर खर्च करने को जो रकम मिली, उसमें से करोड़ों रुपये लैप्स हो गए. आपको हैरानी होगी कि कुल ३१ करोड़ रुपये केंद्र को वापस चले गए. और कोई एक नहीं, हर सांसद इस इम्तिहान में असफल रहा है.

सोचिए कि हमारे प्रदेश के लिए जो नीतियाँ हमारी संसद बनाती है, क्या जनता की आकांक्षाओं से उनका कोई  मेल है? हमारे यहाँ पलायन भयानक रूप धारण कर रहा है. प्रदेश के भीतर ही विषमता की जबरदस्त खाई पैदा हो गयी है. पहाड़ बनाम मैदान का झगडा बढ़ता ही जा रहा है. पहाड़ों की तुलना में मैदानी जिलों की प्रति व्यक्ति आय कहीं ज्यादा है. पहाड़ों में कोई नहीं रहना चाहता. गाँव के गाँव उजड़ रहे हैं. मेहनत और ईमानदारी के संस्कार, जिनके लिए पहाड़ जाने जाते थे, अब हमारे प्रदेश से गायब हो गए हैं. हर आदमी नौकरी चाहता है, लेकिन काम बाहर से आये लोग कर रहे हैं. हमारे नेता स्वयं यह मानते हैं कि बिना रिश्वत यहाँ कोई काम नहीं होता. जिस आबो-हवा के लिए लोग यहाँ आते थे, अब गर्मियों में आप उसे ढूँढते रह जायेंगे. हमारा पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. नतीजतन केदारनाथ जैसी आपदाएं घट रही हैं. लेकिन फिर भी हम जाग नहीं रहे हैं. यही समय है, जब हम अपने लिए सही सोच वाले व्यक्ति को अपने भविष्य की कुंजी सौंप सकते हैं. (अमर उजाला, नैनीताल संस्करण, २ अप्रैल, २०१४ से साभार) 

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