पुराने लेख

तंत्र में हिस्सेदारी के लिए छटपटाता गण

भारतीय गणतंत्र के ६५वें जन्म दिन पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि बीते ६४ वर्षों में हमारा तंत्र अपने गण के कितने निकट पहुँच पाया है? वह स्वाधीनता संग्राम के सपनों को कहाँ तक साकार कर पाया है? यहाँ स्वाधीनता संग्राम के सपनों...

हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य

पिछले एक दशक में देश में आये परिवर्तनों में एक बड़ा परिवर्तन मीडिया में आया बदलाव भी है. अखबार, रेडियो, टीवी और न्यू मीडिया, सब तरफ जबरदस्त उछाल आया है. हिन्दी का सार्वजनिक विमर्श क्षेत्र जितना बड़ा आज है, शायद उतना कभी नहीं था....

टीआरपी का गोरखधंधा

देर से ही सही, टीवी चैनलों की व्यूअरशिप को जांचने के फर्जी तरीकों पर सरकार का ध्यान गया. केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनलों की रेटिंग्स पर नए दिशा-निर्देश जारी किये हैं, जिन्हें लेकर चैनलों की दुनिया में खलबली मची हुई है....

धर्मगुरु का पतन कैसे हुआ

एक ज़माना था जब धर्मगुरुओं ने हमें विश्व भर में प्रतिष्ठा दिलाई थी. लेकिन हाल के वर्षों में उन्होंने हमें बहुत लज्जित किया है. लगातार एक के बाद एक ऐसे किस्से सामने आये हैं, जिनके बारे में सुनते ही उबकाई आने लगती है. हम...

सर्द हवाओं का संगीत

धान की फसल कट चुकी है. खेतों में जगह-जगह रबी की फसल बोई जा रही है. कहीं-कहीं गेहूं की नन्हीं कोंपलें फूटने लगी हैं. काली-काली मिट्टी पर हरे छींट वाली चादर की तरह. सुबह टहलने जाता हूँ तो नन्हीं कोंपलों पर मोती सरीखी ओस...

लड़ने से नहीं डरते उत्तराखंड के खसिया

उत्तराखंड के खसिया. यानी ठाकुर यानी क्षत्रिय जातियों का समूह. हालांकि इस समूह में यहाँ की अनेक ब्राह्मण जातियां भी शामिल रही हैं लेकिन अब यह संबोधन यहाँ के ठाकुरों के लिए रूढ़ हो गया है. एक ज़माना था जब इस भू-भाग पर खसों...

वसंत यानी नव सृजन

माघ शुक्ल पंचमी या श्री पंचमी या वसंत पंचमी से वसंत ऋतु का आरम्भ होता है. भारतीय ऋतुओं के हिसाब से देखें तो माघ और फागुन के महीने शिशिर ऋतु की झोली में आते हैं. यदि मौसम यानी तापमान के हिसाब से देखें तो...

हम कैसा उत्तराखंड चाहते हैं?

लोक सभा चुनाव को अब महज ४० दिन बाक़ी हैं, लेकिन देश के इस अंचल में अभी भी कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं उभर रही है. वजह हम यानी मतदाता नहीं, राजनीतिक दल हैं, जो अब भी कन्फ्यूजन की स्थिति में हैं. भाजपा ने तो...

गंगा: हमारी सभ्यता की जननी

सात-आठ साल पहले की बात है. एक कालेज में पत्रकारिता पढ़ाने हरिद्वार गया हुआ था. हालांकि इससे पहले भी दो-एक बार हरिद्वार जाना हुआ था लेकिन इस बार कुछ फुर्सत में था. मित्र जीतेन्द्र डबराल ने कहा, शाम हो रही है, चलिए गंगा आरती...

पश्चिमी मीडिया का नस्लभेद

टीआरपी और आईआरएस विवादों से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि हमारा मीडिया पूरी तरह से पश्चिम का पिछलग्गू है. उसकी अपनी कोई सोच इतने वर्षों में नहीं बन पाई है. यहाँ तक कि हमारे मीडिया पर परोक्ष नियंत्रण भी उन्हीं...

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